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Couple cancels suicide on V'Day

जब प्रेमी जोड़े दुनिया भर में वैलेंटाइन डे मना रहे थे तो तमाम sms भेजे जा रहे थे, उन्हीं में से एक लवर्स कैंप के मेहमानों के लिए, पेश है -

एक Couple ने वैलेंटाइन डे पर Suicide करने का फैसला किया
लड़का पहले कूदा
लड़की ने आंखें बंद कर ली, और पीछे लौट गई
लड़के ने हवा में पैराशूट खोला
और बोला, "मुझे पता था चुड़ैल - तू नहीं कूदेगी."

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"प्यार की दो चार घड़ी होती है... चाहे थोड़ी भी हो ये उम्र बड़ी होती है... "
वाकई हेमंत दा के मुंह से यह गीत सुनना हर बार एक नायाब अनुभव होता है.
प्यार का इजहार करने के लिए लोग लंबे लंबे खत लिखा करते हैं, और कुछ हैं कि चुप रह कर ही सब कुछ कह देते हैं.
एक बीच का रास्ता भी होता है... नपे तुले शब्दों में अपनी बात कहने का. वैसे भी आज की फटाफट स्टाइल में इससे ज्यादा मुमकिन नहीं होता.
पेंगुइन इंडिया ने एक प्रतियोगिता आयोजित की है.

रोमांटिक मंथ और प्यार का टाइम टेबल


फरवरी का पूरा महीना प्यार के नाम होता है. ज्यादातर लोगों को सिर्फ वैलेंटाइंस डे के बारे में ही मालूम होता है, लेकिन उसके पहले और बाद में कई खास दिन होते हैं और उस दिन की कुछ खास रस्म होती है। तो आइए जानते हैं इस महीने किस दिन किस रस्म का रिवाज है -

उन्हें मनाना इतना भी मुश्किल नहीं

सिर्फ वैलेंटाइन डे ही नहीं, फरवरी का पूरा महीना प्यार के नाम होता है. प्यार के इस खास दिन का काउंट डाउन शुरू हो चुका है. अगर इस वैलेंटाइंस डे को खास बनाने का ख्याल है तो आपको अभी से तैयारी में जुट जाना होगा. अभी आपके हाथ में पूरे दो हफ्ते हैं.
इस पीरियड के हर लम्हे को कोशिश करें कि इतना खास हो कि मेमोरी में यह लाइफ टाइम बिलकुल फ्रेश महसूस हो.

वो चांद सा रौशन चेहरा

उससे मुखातिब होने से पहले मैंने सिर्फ फिल्मी गानों में नायिकाओं की तारीफ सुनी थी... “चांद सा रौशन चेहरा...जुल्फों का रंग सुनहरा...” कैसा होता होगा...यह न तो मालूम था...और ना समझ में आता...कभी देखने को मिलेगा यह भी नहीं पता था...दाखिले से लेकर कॉलेज छोड़ने तक पूरी पढ़ाई को-एड ही रही...लेकिन कोई भी लड़की जमी नहीं...जो थोड़ी बहुत ठीक लगी उसका पहले से ही अफेयर रहा...और जो खाली थीं...उन्हें बहन जी का रुतबा हासिल था...मजाल कि उन्हें कोई नजर भर देख ले...(दरअसल उनकी नजरें कभी ऊपर उठी ही नहीं)उन दिनों एक्स्ट्रा क्लासेज चल रहे थे...मेरी बुआ के यहां एक फंक्शन था...इसलिए छोड़कर जाना पड़ा...तब मैं बीएससी पार्ट टू में था...और बार बार बीमार होने से तंग आ गया था...हालांकि उस वक्त तबीयत थोड़ी बेहतर हो गयी थी...फिर भी इम्तिहान ठीक से दे पाउंगा...यह भरोसा नहीं था...हर तरफ से दबाव झेल रहा था...कुछ घर से भी दबाव था... “बार बार बीमार पड़ रहे हो तो घर आ जाओ...जिंदगी रहेगी तो पढ़ाई-लिखाई होती रहेगी...” इम्तिहान सर पर था...घर से पैसे भी नहीं मांगता था...यों ही पैसे कोई दे गया तो ठीक...वरना...देखी जाएगी...जैसे जुमलों के सहारे जिंदगी चल रही थी...जहां तक दोस्तों की बात है तो...एक दो थे...लेकिन उनका भी मेरे से कहीं ज्यादा इस बात में इंटरेस्ट हुआ करता था कि जब तक वे “तुम्हारे पास चेंज है क्या?” की नौटंकी के साथ पॉकेट से पैसे निकालते...मैं कैंटीन का पेमेंट कर देता था...जानता था...पैसे मुझे ही देने हैं... हम तीनों में से एक ऐसा जोकर था कि हम हंसते हंसते परेशान हो जाया करते थे...पेमेंट के वक्त यही सोचता था चलो यह मनोरंजन कर है...क्योंकि न तो फिल्म देखने जाना होता था ना कहीं और...थ्योरी, प्रैक्टिकल और होम वर्क...इसके अलावा फुर्सत कहां...हम तीनों के अलावा तकरीबन सबकी कोई न कोई गर्लफ्रेंड थी...क्लास के दो लड़कों को छोड़ कर जिन्हें सभी लड़कियां भैया बोलती थीं...दोनों हमेशा बीजी रहते थे...बहनों के किसी न किसी काम में...सड़क से शुरू होने वाले एक लंबे चौड़े अहाते के एक कोने में बुआजी का बड़ा सा घर है...और दूसरी तरफ उससे सटे तीन मकान...जिसमें एक मकान एक प्रिंसिपल साहब का है...उनके एक तरफ एक बैंक मैनेजर और दूसरी तरफ एक डॉक्टर साहब का घर है...दरअसल तीनों लोग किराए पर कहीं एक ही मकान में रहते थे...कभी बातचीत के दौरान तीनों सहेलियों (तीनों की पत्नियों) प्रिंसपलाइन, डॉक्टराइन और मैनेजराइन ने तय किया

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